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अब 2024 की तैयारी: बंगाल के रिजल्ट ने देश में क्षेत्रीय दलों की राजनीति मजबूत की, नीतीश कुमार बदल सकते हैं रणनीति, अभी लालू भी आजाद

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पटनाएक घंटा पहलेलेखक: बृजम पांडेय

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नीतीश कुमार अभी भी NDA में कंफर्टेबल महसूस नहीं कर रहे हैं। गाहे-बगाहे यह जता दिया जाता है कि वो BJP की बदौलत CM की कुर्सी पर बैठे हैं।

राजनीति में ऊंट किस करवट बैठेगा, इसका अंदाजा कोई नहीं लगा सकता है। कहा जाता है राजनीति अवसर का खेल है। पश्चिम बंगाल में TMC की जीत के बाद विरोधी दलों का हौसला बुलंद हुआ है। हौसला बुलंद तो उन पार्टियों का भी हुआ है जो किसी ना किसी मजबूरी से BJP के साथ मिलकर राज्यों में सरकार चला रहे हैं। ऐसा ही प्रदेश बिहार है, जहां CM तो नीतीश कुमार हैं लेकिन BJP की सहयोग से। नीतीश कुमार की छवि समाजवादी नेता की रही है। वो BJP के कट्टर राष्ट्रवाद का समर्थन नहीं करते। लेकिन, सत्ता में बने रहने की मजबूरी कहिए या फिर सत्ता से लालू परिवार को अलग रखने का हठ, नीतीश कुमार को BJP के साथ सरकार में रहने को मजबूर करता है।

नीतीश के दिए बधाईयों के अलग-अलग मायने

CM नीतीश कुमार ने हाल में हुए दूसरे राज्यों के विधानसभा चुनाव में क्षेत्रीय दलों के जीत पर बधाई दी है। नीतीश ने सोशल मीडिया पर चार पोस्ट किए। इसमें BJP को असम और पुड्डुचैरी के लिए बधाई दी। लेकिन केरल और तमिलनाडु के मुख्यमंत्रियों को यह जताया कि उनसे रिश्ते बहुत प्रगाढ़ हैं। वहीं, बंगाल में जीत के लिए ममता बनर्जी को बधाई ना देते हुए नीतीश कुमार ने TMC को बधाई दी। इन चार बधाईयों के अलग-अलग मायने हैं।

वरिष्ठ पत्रकार रवि उपाध्याय बताते हैं कि यह बयान आने वाले दिनों में राजनीतिक घटनाक्रम की तरफ इशारा करते हैं। नीतीश कुमार की छवि देश में अलग रही है। उनपर BJP के राष्ट्रवाद का रंग नहीं चढ़ा है। ऐसे में इस बयान को देखा जाए तो नीतीश कुमार ने यह साबित कर दिया कि क्षेत्रीय पार्टियों में वो एकमात्र चेहरा हैं, जिसको लेकर सभी आगे बढ़ सकते हैं। उन्होंने तमिलनाडु के स्टालिन और केरल के विजयन के रिश्ते को लेकर भी साफ कर दिया कि उनसे समर्थन मिल रहा है। वहीं, उन्होंने ममता को छोड़ कर TMC का नाम लिया है, उन्हें पता है कि यदि कोई नीतीश कुमार को टक्कर दे सकता है तो वो हैं ममता बनर्जी। ऐसे में यदि 2024 के लिए कोई फ्रंट तैयार हो तो नीतीश कुमार उसके चेहरा बनें, इसकी तैयारी है।

नीतीश में देश भर की क्षेत्रीय पार्टियों को एकजुट करने की क्षमता

राजनीतिक पंडितों की मानें तो NDA में नीतीश कुमार कंफर्टेबल महसूस नहीं कर रहे हैं। गाहे-बगाहे उनके सामने यह जता दिया जाता है कि वो BJP की बदौलत CM की कुर्सी पर बैठे हैं। ऐसे में कभी PM मैटेरियल रह चुके नीतीश कुमार एक बार फिर से पूरे देश की क्षेत्रीय पार्टियों को एकजुट कर सकते हैं। इनकी इस मुहिम में साथ उन दलों का मिलेगा जो BJP विरोध की राजनीति करते हैं। पंजाब, महाराष्ट्र, झारखंड, तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल सहित वो क्षेत्रीय दल, जो कहीं सत्ता में नहीं लेकिन अपने राज्य में मजबूत पकड़ रखते हैं, वो नीतीश कुमार का साथ दे सकते हैं।

लालू का जेल से बाहर आना संजीवनी

इधर, RJD सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव का जेल से बाहर आना सभी क्षेत्रीय दलों के लिए संजीवनी है। लालू यादव की राजनीति BJP विरोधी रही है। बिहार में अपने पुत्र तेजस्वी यादव को स्थापित करने को लेकर लालू खुल कर दांव खेलेंगे। लालू ही थे कि 2013 में जब नीतीश कुमार ने इस्तीफा दिया था तो बाहर से समर्थन देकर JDU को सत्ता में रखा था और 2015 में JDU और RJD ने मिलकर BJP को विपक्ष में धकेल दिया था। ऐसे में यदि लालू यादव की चली तो RJD फिर से सत्ता के गलियारे में पहुंचने में कामयाब होगा। बशर्ते कि नीतीश कुमार की महत्वाकांक्षा देश की राजनीति करने की हो जाए।

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