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आज का इतिहास: चीन ने लोकतंत्र समर्थक 10 हजार प्रदर्शनकारियों को गोलियों से भून डाला, टैंक लेकर पहुंची सेना ने निहत्थे लोगों का किया संहार

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29 मिनट पहले

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1989 में आज ही के दिन बीजिंग के थियानमेन चौक पर चीन ने अपने ही नागरिकों के खिलाफ सेना को उतार दिया था। ये प्रदर्शनकारी चीन में लोकतांत्रिक सुधारों की मांग कर रहे थे। सेना ने इन प्रदर्शनकारियों पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। इस घटनाक्रम में कम से कम 10 हजार लोग मारे गए। चीन ने कभी भी मरने वालों की सही संख्या को सार्वजनिक नहीं किया।

इस आंदोलन की शुरुआत छात्र आंदोलन के तौर पर हुई थी। दरअसल 80 के दशक में चीन बड़े-बड़े बदलावों से गुजर रहा था। चीन के कम्युनिस्ट नेता देंग शियाओपिंग ने अर्थव्यवस्था में आर्थिक सुधारों की शुरुआत की, जिसकी बदौलत देश में विदेशी निवेश बढ़ा और प्राइवेट कंपनियां आने लगीं। नतीजा ये हुआ कि चीन की अर्थव्यवस्था ने रफ्तार पकड़ी और समाज में आर्थिक संपन्नता आने लगी, लेकिन विकास की बढ़ती रफ्तार के साथ भ्रष्टाचार, महंगाई और रोजगार में कमी जैसी समस्याएं भी सामने आईं। इसी दौरान चीन के लोग जब दूसरे लोकतांत्रिक देशों के संपर्क में आए तो उनमें भी लोकतंत्र के प्रति दिलचस्पी बढ़ने लगी।

इन सबका नतीजा ये हुआ कि चीनी नागरिकों के बीच एक आंदोलन जन्म लेने लगा। चीनी नेता देंग शियाओपिंग ने इस सबके के लिए कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव हू याओबांग को जिम्मेदार माना। हू याओबांग चीन में राजनीतिक सुधारों की पैरवी करते आए थे। अप्रैल में उनकी अचानक मौत हो गई, जिससे माहौल और गर्म हो गया। हजारों लोग उन्हें श्रद्धांजलि देने बीजिंग के थियानमेन चौक पर इकट्ठा हुए। धीरे-धीरे प्रदर्शनकारियों का जमावड़ा बढ़ता गया और इसी चौक पर ‘प्रजातंत्र की मूर्ति’ को स्थापित किया गया। हालात काबू से बाहर होते देख सरकार ने चीन में मार्शल लॉ लागू कर दिया। कई लोगों को जेलों में डाल दिया गया।

4 जून, 1989 के दिन थियानमेन चौक पर हजारों छात्र और लोग शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे थे, तभी हथियारों से लदे चीनी सैनिक अपने साथ टैंक लेकर आने लगे। सेना ने पूरे चौक को घेर लिया और गोली बरसानी शुरू कर दी। प्रदर्शनकारियों को अनुमान नहीं था कि उनके ही देश की सेना उन पर इस तरह से गोलियां बरसाएगी।

सेना के इस नरसंहार में कितने लोग मारे गए, इसका सटीक आंकड़ा किसी के पास नहीं है। चीन सरकार ने 200 लोगों के मरने की पुष्टि की, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि कम से कम 10 हजार लोग इस नरसंहार में मारे गए। 5 जून की सुबह तक थियानमेन चौक पर प्रदर्शनकारियों की जगह सेना के टैंकों ने कब्जा कर लिया। चीन सरकार ने क्रूरता से इस नागरिक आंदोलन को दबा दिया था।

1783: हॉट एयर बैलून की पहली उड़ान

17वीं शताब्दी की शुरुआत में ही गुब्बारे में गर्म हवा भरकर उसे एक-जगह से दूसरी जगह उड़ाकर ले जाने की कोशिशें की जाने लगी थीं। इन तमाम कोशिशों को आज ही के दिन एक बड़ी सफलता मिली थी। दो भाईयों – जोसेफ माइकल और जैक एटीने मोंटगोल्फायर ने 1738 में आज ही के दिन गर्म हवा से गुब्बारे को उड़ाया था। उन्होंने एक बड़े पेपर बैग को गुब्बारे का आकार देकर उसके नीचे ऊन और लकड़ी की कतरन जलाकर गर्म हवा छोड़ी। इसके बाद गुब्बारा आकाश में करीब 1 हजार फीट की ऊंचाई पर 10 मिनट तक उड़ता रहा। 10 मिनट बाद जहां से गुब्बारा हवा में उड़ाया गया था, उस जगह से करीब आधा किलोमीटर दूर जाकर नीचे आया। इसके बाद दोनों भाईयों ने यूरोप की अलग-अलग जगहों पर इस गुब्बारे को लोगों के सामने उड़ाया।

उन्होंने गुब्बारे के नीचे एक डलिया बांधकर एक मुर्गा, बतख और भेड़ को एक साथ उड़ाने में भी सफलता पाई। ये गुब्बारा करीब 8 मिनट तक हवा में रहा। इसी साल 21 नवंबर के दिन 2 लोगों को बैठाकर इसी गुब्बारे को हवा में उड़ाया गया। ये हॉट एयर बैलून में इंसानों की पहली उड़ान थी।

1917 में सेंट लुइस पोस्ट डिस्पैच और न्यूयॉर्क वर्ल्ड अखबार की शुरुआत करने वाले जोसेफ पुलित्जर के नाम पर पुलित्जर पुरस्कार की शुरुआत हुई।

1917 में सेंट लुइस पोस्ट डिस्पैच और न्यूयॉर्क वर्ल्ड अखबार की शुरुआत करने वाले जोसेफ पुलित्जर के नाम पर पुलित्जर पुरस्कार की शुरुआत हुई।

1917: पहला पुलित्जर पुरस्कार दिया गया

अमेरिका के एक प्रतिष्ठित पत्रकार थे – जोसेफ पुलित्जर। उन्होंने सेंट लुइस पोस्ट डिस्पैच और न्यूयॉर्क वर्ल्ड अखबार की शुरुआत की थी। ये दोनों अखबार बेहतरीन पत्रकारिता का उदाहरण माने जाते थे। अपनी मौत से पहले उन्होंने कोलंबिया यूनिवर्सिटी को करीब साढ़े छह करोड़ रुपए की राशि दान कर दी थी। इसी पैसे से बाद में उनके नाम पर साल 1917 से पुलित्जर पुरस्कार शुरू किया गया।

यह अमेरिका का पत्रकारिता के क्षेत्र में दिया जाने वाला सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार है। यह पुरस्कार पत्रकारों, साहित्य और संगीत रचना के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वालों को दिया जाता है। इसकी कुल 21 कैटेगरी है और पुरस्कार देने का पूरा जिम्मा कोलंबिया यूनिवर्सिटी संभालती है।

आज ही के दिन साल 1917 में पहला पुलित्जर अवॉर्ड दिया गया था। जुलिया वार्ड होवे की बायोग्राफी के लिए उनकी दो बेटियों रिचर्ड्स और मोड होवे इलियट को पुलित्जर पुरस्कार मिला था। जुलिया वार्ड होवे एक जानी-मानी महिला अधिकार कार्यकर्ता, कवयित्री और लेखिका थीं।

4 जून 2001 को ज्ञानेंद्र वीर विक्रम शाह नेपाल के नए राजा बने।

4 जून 2001 को ज्ञानेंद्र वीर विक्रम शाह नेपाल के नए राजा बने।

2001: ज्ञानेंद्र बने नेपाल के राजा

1 जून 2001 को नेपाल के क्राउन प्रिंस दीपेंद्र ने नशे में राजपरिवार के 9 लोगों की हत्या कर दी थी। इस हत्याकांड में उनके पिता राजा बीरेंद्र, माता रानी ऐश्वर्या और राजपरिवार के 7 और लोग मारे गए थे। कहा जाता है कि प्रिंस दीपेंद्र अपनी पसंद से शादी करना चाहते थे, लेकिन राजपरिवार इसके लिए राजी नहीं था, यही इस हत्याकांड की वजह बना। राजपरिवार पर गोली बरसाने के बाद दीपेंद्र ने खुद पर भी गोली चलाई थी, जिस वजह से आज ही के दिन उनकी मौत हो गई। दीपेंद्र की मौत के बाद उनके चाचा ज्ञानेंद्र वीर विक्रम शाह को नेपाल का राजा बनाया गया।

4 जून के दिन को इतिहास में इन महत्वपूर्ण घटनाओं की वजह से भी याद किया जाता है…

2019: जापान में ऑफिस में अनिवार्य रूप से हाई हील पहनने को लेकर सोशल मीडिया पर आंदोलन शुरू हुआ।

2010: एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स ने फ्लोरिडा से रॉकेट फाल्कन-9 को लॉन्च किया।

2008: बराक ओबामा ने राष्ट्रपति पद के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवारी हासिल की।

2005: लालकृष्ण आडवाणी ने एक हफ्ते का पाकिस्तान का दौरा किया। आज ही के दिन आडवाणी ने कराची में मोहम्मद अली जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति बताया। आडवाणी के इस बयान पर खासा विवाद हुआ।

1973: ATM के लिए डोन वेत्जल, टॉम बार्न्स और जॉर्ज चैस्टन को पेटेंट मिला।

1972: बांग्लादेश में 2 ट्रेनों की टक्कर में 76 लोगों की मौत हो गई।

1919: अमेरिकी संविधान के 19वें संशोधन को सीनेट ने मंजूरी दी। इस संशोधन के द्वारा ही अमेरिका में महिलाओं को मताधिकार मिला।

1896: ऑटोमोबाइल कंपनी फोर्ड के मालिक हेनरी फोर्ड खुद की डिजाइन की हुई पहली ‘क्वाड्रिसाइकिल’ को लेकर डेट्रॉइट की सड़कों पर निकले।

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