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नक्सल मुठभेड़: अनुभवी ‘सीआरपीएफ’ कमांडर क्यों किए जाते हैं नजरअंदाज, गोपनीय रिपोर्ट से लेकर प्रमोशन तक हैं कई सवाल

सार

सीआरपीएफ के पूर्व आईजी वीपीएस पवार कहते हैं, ‘फील्ड में तैनात कैडर अफसर को पोस्टिंग कमांड मिलनी चाहिए। जो युवा अफसर नक्सल, कश्मीर या उत्तर-पूर्व में तैनात हैं, उन्हें पदोन्नति से वंचित किया जा रहा है। मजबूरी में अफसरों को अदालतों का रुख करना पड़ रहा है।’

नक्सलियों का सामना करते शहीद हुए बहादुर सुरक्षाकर्मियों को जगदलपुर में श्रद्धांजलि अर्पित करते गृह मंत्री अमित शाह
– फोटो : Amar Ujala

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बीजापुर में नक्सलियों के साथ हुई मुठभेड़ अपने पीछे कई अहम सवाल छोड़ गई है। इस ऑपरेशन में सीआरपीएफ की कोबरा विंग, डीआरजी और एसटीएफ जैसी विशेषज्ञ फोर्स शामिल थीं। सीआरपीएफ डीजी कुलदीप सिंह भले ही इसे रणनीतिक चूक नहीं मानते हैं, लेकिन इसी बल के पूर्व अधिकारी कुछ ऐसी बातों की तरफ इशारा कर रहे हैं, जो सीधे तौर पर जोखिम भरे ऑपरेशन की कमान संभालने वाले कमांडरों के मनोबल से जुड़ी हैं।

इतना ही नहीं, वे यह भी दावा करते हैं कि ऐसे ऑपरेशनों की रणनीति जो मौजूदा या पूर्व आईपीएस तैयार कर रहे हैं, उन्हें फील्ड स्तर की पूरी जानकारी नहीं है। पूर्व अफसरों ने केंद्रीय गृह मंत्रालय में लंबे समय से कार्यरत एक सलाहकार की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। सीआरपीएफ के ग्राउंड कमांडर, जो नक्सलियों की रणनीति और उनके ठिकानों से वाकिफ हैं, ऑपरेशन का खाका खींचते वक्त उन्हें नजरअंदाज किया जाता है। मुंह खोलने पर गोपनीय रिपोर्ट खराब करने से लेकर उनके पदोन्नति रोकने, जैसी बातें ग्राउंड कमांडरों का मनोबल कमजोर कर रही हैं।

किन लोगों की राय से खींच रहे हैं ‘ऑपरेशन’ का खाका

सीआरपीएफ के तेजतर्रार पूर्व आईजी एसएस संधू बताते हैं, ऐसे में रणनीतिक चूक होती है। आला अफसर इस बात को कभी स्वीकार नहीं करेंगे, यह भी सच है। मेरा सवाल है, नक्सली ऑपरेशन में कौन लोग ऑपरेशन का खाका खींच रहे हैं। वे अफसर, जिन्हें जंगल की की कोई जानकारी नहीं है। नक्सलियों की रणनीति कैसे बदलती है, वे इसके बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानते। जिन कैडर अधिकारियों को नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में काम करते हुए दशक बीत गया है, उनकी बातों को तव्वजो नहीं दी जाती।

संधू जगदलपुर में डीआईजी रहे हैं। नक्सलियों के कब्जे वाले ‘अबूझमाड़’ में सीआरपीएफ की 16 बटालियन खड़ी करने में उनकी खास भूमिका रही थी। वे कहते हैं, कई बार वहां के जंगलों में 30, 50 और 70 किलोमीटर तक का अंतर देखने को मिलता है। ऐसे में पार्टी को मदद मिलने देरी होती है। उसी जगह पर रिजर्व में कोई पार्टी नहीं होती। बतौर संधू, सीआरपीएफ के एक आईजी नलिन प्रभात हैं। एक दशक पहले दंतेवाड़ा में जब सीआरपीएफ के 76 जवान मारे गए थे, उस वक्त वे वहीं पर डीआईजी थे। उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। वजह, सियासत में उनके गहरे रसूख थे। मौजूदा समय में भी वे आईजी ‘ऑपरेशन’ हैं।

मार्च-अप्रैल में ही सुरक्षा बलों पर होते हैं बड़े हमले

संधू के मुताबिक, एसओपी बनाने का तरीका सही नहीं है। एक प्लाटून से अगर जवान ऑपरेशन के लिए निकलते हैं तो पीछे बचे जवानों पर नक्सली हमला हो सकता है। जब ये जानकारी है कि नक्सली कमांडर ‘हिडमा’ ने मिलिट्री बटालियन खड़ी कर रखी है। इसमें एक हजार से ज्यादा लड़ाके हैं। इसके बावजूद कम संख्या में जवानों को आगे भेज रहे हैं। ये एक रणनीतिक चूक है। ऑपरेशन का ये समय ठीक नहीं है। इस मौसम में सैंकड़ों किलोमीटर पैदल चलना, जवानों के लिए मुश्किल होता है। उन्हें स्वास्थ्य को लेकर कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

अतीत में देखेंगे तो मालूम होगा कि नक्सलियों ने मार्च और अप्रैल में ही सुरक्षा बलों को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ के कैडर अफसर को आईजी नहीं बनाया जाता, वहीं नक्सल क्षेत्र के लिए गैर-अनुभवी एक आईपीएस को कमान सौंप देते हैं। कमांडरों के मनोबल को तब ठेस पहुंचती है, जब उन्हें समय पर पदोन्नति नहीं मिलती। उनकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट खराब कर दी जाती है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में कई अफसरों के साथ ऐसा हुआ है। जिन युवा अफसरों ने अपने हकों के लिए कोर्ट में गुहार लगाई, उनकी एसीआर खराब कर दी गई। अभी तक 35 अफसरों के प्रमोशन की फाइल अटकी है। जिन कमांडरों को पांच-छह शौर्य पदक हैं, वे अभी टूआईसी के पद तक पहुंचे हैं, जबकि नियमानुसार उन्हें अब डीआईजी बन जाना चाहिए था।

आर्मी में डेपुटेशन नहीं है तो सीएपीएफ में क्यों?   

सीआरपीएफ के पूर्व आईजी वीपीएस पवार कहते हैं, फील्ड में तैनात कैडर अफसर को पोस्टिंग कमांड मिलनी चाहिए। वजह, इनका लंबा सेवाकाल फील्ड में ही गुजरता है। जो युवा अफसर नक्सल, कश्मीर या उत्तर-पूर्व में तैनात हैं, उन्हें पदोन्नति से वंचित किया जा रहा है। मजबूरी में अफसरों को अदालतों का रुख करना पड़ रहा है। सरकार इन्हें ओजीएएस का फायदा देकर प्रमोशन दे। इसके बाद उन्हें ऑपरेशन की कमांड दे दी जाए।

वे कहते हैं, जब आर्मी में कोई डेपुटेशन पर नहीं आता तो सीएपीएफ में क्यों यह व्यवस्था जारी रखी गई है। केंद्र में सलाहकार के पद पर एक ही अफसर दस साल से सेवाएं दे रहा है, जबकि अब उनके पास फील्ड का अनुभव नहीं है। नक्सली तो रोज अपनी रणनीति बदलते हैं। कैडर के जिन अफसरों ने अपने जीवन के 30 साल फील्ड में गुजारे हैं, हर तरह का अनुभव हासिल किया है, इंटेलिजेंस रिपोर्ट कैसे लेनी है, उसका क्रॉस चेक कैसे करना है, ये सब बातें अच्छे से जानने के बाद भी उन्हें सलाहकार पद की जिम्मेदारी नहीं मिलती। यहां तक कि नक्सली ऑपरेशन में उन्हें दिल्ली या बड़े शहर में बैठे अधिकारियों द्वारा तैयार रणनीति के तहत आगे बढ़ना पड़ता है। बतौर पवार, सरकार यदि रणनीतिक बैठक में कैडर अफसरों को अपनी बात कहने का मौका दे तो नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई बहुत प्रभावी तरीके से एवं जल्द जीती जा सकती है।

हमले में शहीद जवानों पर श्वेत पत्र जारी करने की मांग

कॉन्फेडरेशन ऑफ एक्स पैरामिलिट्री फोर्स वेलफेयर एसोसिएशन के महासचिव रणबीर सिंह कहते हैं, सीआरपीएफ हमेशा युद्धरत रहती है। कभी माओवादी प्रभावित इलाकों में तो कभी आतंकवादियों से टक्कर लेते रहते हैं। साधारण घरों से आए इसके जाबांज जवानों ने कभी पीछे कदम नहीं खींचा। इनका काम पूरा सैनिक का है, फिर भी इसे अर्ध सैनिक बल कहते हैं। सरकारी श्रेणियों की अपनी व्यवस्था होती है। हम सोचते नहीं कि अर्ध सैनिक क्या होता है। सैनिक होता है या सैनिक नहीं होता है। मुंह से सभी बोल देते हैं कि इतने जवान शहीद हो गए, लेकिन फाइलों में तो ‘डेड’ शब्द का इस्तेमाल होता है। संसद में कितनी बार यह सवाल उठा कि इन बलों में जान देने वालों को शहीद का दर्जा दिया जाए, लेकिन सरकार नहीं सुन रही। सरकार की इच्छा शक्ति पर संदेह व्यक्त करते हुए रणबीर सिंह ने कहा, आए दिन अर्धसैनिक बलों के जवान शहीद हो रहे हैं। ट्वीटर पर मात्र शोक सांत्वना संदेश देकर खाना पूर्ति कर दी जाती है। एसोसिएशन ने 15 सालों के दौरान नक्सली हमले में शहीद हुए अर्धसैनिकों पर श्वेत पत्र जारी करने की मांग की है।

विस्तार

बीजापुर में नक्सलियों के साथ हुई मुठभेड़ अपने पीछे कई अहम सवाल छोड़ गई है। इस ऑपरेशन में सीआरपीएफ की कोबरा विंग, डीआरजी और एसटीएफ जैसी विशेषज्ञ फोर्स शामिल थीं। सीआरपीएफ डीजी कुलदीप सिंह भले ही इसे रणनीतिक चूक नहीं मानते हैं, लेकिन इसी बल के पूर्व अधिकारी कुछ ऐसी बातों की तरफ इशारा कर रहे हैं, जो सीधे तौर पर जोखिम भरे ऑपरेशन की कमान संभालने वाले कमांडरों के मनोबल से जुड़ी हैं।

इतना ही नहीं, वे यह भी दावा करते हैं कि ऐसे ऑपरेशनों की रणनीति जो मौजूदा या पूर्व आईपीएस तैयार कर रहे हैं, उन्हें फील्ड स्तर की पूरी जानकारी नहीं है। पूर्व अफसरों ने केंद्रीय गृह मंत्रालय में लंबे समय से कार्यरत एक सलाहकार की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। सीआरपीएफ के ग्राउंड कमांडर, जो नक्सलियों की रणनीति और उनके ठिकानों से वाकिफ हैं, ऑपरेशन का खाका खींचते वक्त उन्हें नजरअंदाज किया जाता है। मुंह खोलने पर गोपनीय रिपोर्ट खराब करने से लेकर उनके पदोन्नति रोकने, जैसी बातें ग्राउंड कमांडरों का मनोबल कमजोर कर रही हैं।

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