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ब्लैक फंगस का कहर: आंख-जबड़ा निकालने के डर से 75 मरीज सरकारी अस्पताल से चले गए और इधर आयुर्वेद से इलाज कराने को रोज बढ़ रही कतार

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  • Due To The Fear Of Removing The Eye And Jaw, 75 Patients Left The Government Hospital And There Is An Increasing Queue Every Day To Get Treatment From Ayurveda.

सूरतएक घंटा पहले

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सिविल अस्पताल में गुरुवार को ब्लैक फंगस के 12 मरीजों की सर्जरी हुई। एक की आंख निकाली गई।

  • सिविल अस्पताल में दो मरीजों की मौत, 12 की सर्जरी, एक की आंख निकाली
  • आयुर्वेद से इलाज कराने को रोज बढ़ रही कतार

ब्लैक फंगस के मरीज डरे हुए हैं। आंख-नाक, जबड़ा निकालने और उसके बाद भी जिंदगी की गारंटी नहीं होने पर सिविल-स्मीमेर अस्पताल से मरीज भाग रहे हैं। पिछले एक महीने में सिविल और स्मीमेर अस्पताल से डिस्चार्ज अगेंस्ट मेडिकल एडवाइज (डामा) लेकर 75 मरीज चले गए। इनमें 45 मरीज सिविल अस्पताल के हैं, जबकि 30 स्मीमेर के हैं।

वहीं दूसरी और आयुर्वेद से इलाज कराने के लिए रोज मरीजों की कतार बढ़ रही है। आयुर्वेदिक क्लीनिक में बिना आंख-नाक, जबड़ा निकाले मरीजों को अच्छा किया जा रहा है। अभी सूरत में ब्लैक फंगस के रोज 10 से 12 नए मरीज आ रहे हैं। अस्पताल से डामा लेकर चले जाने वाले मरीजों में से कुछ ने बताया कि लंबे समय से अस्पताल में होने के बाद भी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ।

सूरत में अभी ब्लैक फंगस के 500 से ज्यादा मरीज एक्टिव हैं। 100 से अधिक मरीजों की जान जा चुकी है। करीब 400 मरीज अपनी आंख, जबड़ा और साइनस गंवा चुके हैं, फिर भी ठीक नहीं हुए हैं। उन्हें अभी भी इलाज के लिए अस्पताल आना पड़ रहा है। गुरुवार को सिविल अस्पताल में 2 मरीजों की मौत हो गई।

12 ऑपरेशन में एक मरीज की आंख निकालनी पड़ी। यहां अब तक 25 की जान जा चुकी है। 128 मरीज भर्ती हैं। अब तक 284 सर्जरी की है और 40 को डिस्चार्ज किया गया है। 50 से अधिक मरीजों की हालत गंभीर है। दूसरी तरफ स्मीमेर में गुरुवार को एक मरीज आया। 2 मरीजों की सर्जरी हुई। अभी 47 भर्ती हैं। 50 सर्जरी और 12 मौत हो चुकी है।

केस 1 एक माह से भर्ती थी, लेकिन आराम नहीं हुआ तो डामा ले लिया

मांडवी निवासी 54 वर्षीय एक महिला ने बताया कि पहले उसका निजी अस्पताल में इलाज हुआ। महज 7 दिन में 9 लाख खर्च हो गए। बाद में सिविल आई। यहां एक माह से भर्ती थी। निजी अस्पताल में एक बार और सिविल में दो बार सायनस का ऑपरेशन हो चुका था। जबड़े का भी ऑपरेशन किया गया। 21 दिन का इंजेक्शन का कोर्स भी पूरा हो गया पर आराम नहीं मिल रहा है। परिजन मांडवी से यहां आते-जातेे थे। परेशान होकर मरीज ने डामा ले लिया।

केस 2 दो ऑपरेशन पर राहत नहीं, आंख निकालने को कहा तो घर चली गई

डिंडोली निवासी 48 वर्षीय महिला ने बताया कि ब्लैक फंगस का पहले एक निजी अस्पताल में इलाज हुआ। इंजेक्शन नहीं मिलने पर सिविल में भर्ती हुई। यहां एक माह तक इलाज चला। दो बार ऑपरेशन हुआ। इंजेक्शन का कोर्स भी पूरा हो गया, पर आराम नहीं मिला। डॉक्टरों ने आंख निकालने कहा। डर से परिजन उन्हें घर लेकर चले गए।

केस 3 एक आंख निकाल दी, दूसरी भी निकालने को कह रहे थे

खटोदरा निवासी 68 वर्षीय बुजुर्ग ने बताया कि निजी अस्पताल में ढाई लाख रुपए खर्च के बाद भी आराम नहीं हुआ तो स्मीमेर चले गए। वहां एक माह इलाज चला। आंख भी निकाल दी पर आराम नहीं मिला। डाॅक्टर कह थे कि दूसरी आंख भी निकालनी पड़ सकती है। हम घर चले आए। दूसरी आंख नहीं निकलवानी भले जान जाए।

कोर्स पूरा होने पर भी सुधार नहीं तब आंख निकालने को कहते हैं

कई मरीजों का कोर्स लगभग पूरा हो जाने के बाद भी इम्प्रूवमेंट नहीं होता तो उन्हें आंख निकालने को कहा जाता है। इससे डर कर भी मरीज चले जाते हैं। वहीं सबसे ज्यादा मरीज ऐसे हैं जो निजी अस्पताल में ऑपरेशन करवाकर आए हैं। यहां इंजेक्शन लेते हैं और फिर निजी अस्पताल में फाॅलोअप के लिए डामा ले लेते हैं। -डॉ. आनंद चौधरी, प्रोफेसर, ईएनटी विभाग, सिविल अस्पताल

आयुर्वेदिक इलाज कराने के लिए राजस्थान, एमपी-यूपी और महाराष्ट्र से भी मरीज आ रहे

भास्कर में पिछले दिनों आयुर्वेद के इलाज से ब्लैक फंगस के मरीजों की रिकवरी की खबर की चर्चा देशभर में हुई। 70 मरीजों को राहत देने वाले आयुर्वेद के डॉ. रजनीकांत पटेल के क्लीनिक में अब राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र के साथ-साथ साउथ गुजरात, सौराष्ट्र के भी मरीज इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। राजस्थान में भी आयुर्वेद के इलाज को लेकर एलोपैथिक डॉक्टरों में भी सकारात्मकता दिख रही है। इसी से आयुर्वेदिक अस्पतालों-क्लीनिक पर मरीजों बढ़ रहे हैं।

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गुजरात | दैनिक भास्कर

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