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इस बार भी नहीं लगेगा सुल्तानगंज में श्रावणी मेला: सावन में लगने वाली करीब 2000 अस्थायी दुकानें इस बार नहीं सजेंगी, 3500 लोगों के रोजी-रोटी पर असर

भागलपुर18 मिनट पहलेलेखक: कृष्ण बल्लभ नारायण

श्रावणी मेले के दौरान यहीं सजती थीं दुकानें।

श्रावणी मेला न सिर्फ धार्मिक बल्कि सुल्तानगंज से देवघर तक की 105 किलोमीटर क्षेत्र की एक बड़ी आबादी की एक आर्थिक मेला है। हालांकि, अब यह दूरी घटकर 88 किलोमीटर रह गई है। इस मेले के एक महीने की कमाई से हजारों परिवार पूरे साल तक जीते हैं। लेकिन, वर्तमान परिवेश में अभी भी श्रावण मेला को लेकर कावंरियों और उन दुकानदारों में उहापोह की स्थिति बनी हुई है। हालांकि, झारखंड सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि श्रावणी मेला नहीं लगेगा।

श्रावणी मेला के शुरू होने से पहले से ही सुल्तानगंज में करीब 2000 अस्थायी दुकानें खुल जाती थी। इनमें फल-फूल, चुड़ी लहठी, पूजा, विश्रामस्थल, दुकानों में खाने पीने के लिए छोटे बड़े होटल के साथ साथ ठहरने और रास्ते भर के लिए आवश्यक चीजों की दुकानें सज जाती थीं। इसके लिए मनमाने तरीके से भाड़े भी वसूले जाते हैं जो वार्षिक आय के रूप में काम आता है। इस संबंध चूड़ी लहटी विक्रेता महेश दास ने बताया कि यह भाड़ा 1000 से शुरू होकर 10 से 15 लाख तक का भी होता है। यह जगह और क्षेत्रफल पर निर्भर है। करीब 3500 लोगों का रोजगार प्रभावित हुआ है।

ठहराव में भी होती है कमाई

सुरेश तांती, गोपाल झा ने बताया कि शहर से लेकर सुदूर क्षेत्रों में ठहराव के नाम पर भी मनमाना रुपये वसूले जाते हैं। उन्होंने बताया कि मेला मुख्य रूप से सावन के एक महीने तक ही रहता है लेकिन विगत 5-6 सालों से भादों महीने में भी सावन महीने की तरह ही भीड़ भाड़ रहती हैं। इस दौरान सुल्तानगंज शहर से लेकर देवघर के पूरे रास्ते में टेंट और पंडाल के ठहराव बनाए जाते हैं जो मनमाना रुपया वसूलते हैं। सुल्तानगंज निवासी प्रफ्फुलचंद मिश्रा बताते हैं कि केवल शहर से भाड़ा के नाम पर करीब डेढ़ से 2 करोड़ रुपए की आमदनी होती हैं।

ट्रांसपोर्टरों को भी हो रहा है नुकसान

सावन महीने में लगने वाले श्रावणी मेले में न सिर्फ बिहार के कोने कोने से बल्कि बिहार के अलावे दूसरे राज्यों से भी श्रद्धालु देवघर में जलाभिषेक करने के लिए सुल्तानगंज आते हैं। उसमें लग्जरी गाड़ियों के साथ साथ बस और ट्रक से भी लोग भर भर कर आते हैं| उनमे झारखण्ड ,उत्तर प्रदेश, उड़ीसा ,पश्चिम बंगाल आदि से लोग इस यात्रा में शामिल होने आते हैं। इससे ट्रांसपोर्टरों की भी अच्छी कमाई होती है लेकिन पिछले साल की तरह इस साल भी कोरोना की वजह से उनके इस आमदनी पर ग्रहण लगता दिख रहा है।

पंडाओं की कमाई पर लगने लगा ग्रहण

बात सुल्तानगंज की हो या देवघर की सबसे ज्यादा कमाई पंडाओं की होती है। दरअसल, हर साल 70 से 75 लाख कांवरिए सुल्तानगंज से जल लेकर देवघर जलाभिषेक करते हैं। वैसे तो इन पंडाओं की कमाई सालों भर होती है लेकिन कहा जाता है कि ये लोग एक महीने की कमाई से सालों भर बैठकर खाते हैं लेकिन पिछले साल के लॉकडाउन ने इनकी कमर तोड़ दी है। इस बावत सुल्तानगंज के मारवाड़ी युवा मंच के उपाध्यक्ष मनोजं कुमार जादुका ने बताया कि अब तो पंडा समाज में भी लोग नौकरी वगैरह करने लगे हैं लेकिन अभी भी लाखों पंडा परिवार ऐसे हैं जिनके जीविकोपार्जन का आधार यही है, उनकी हालत बहुत खराब हो गई है।

जमीन मालिकों को हुआ नुकसान

मारवाड़ी युवा मंच के उपाध्यक्ष मनोजं कुमार जादुका ने बताया कि सुल्तानगंज से लेकर देवघर के रास्ते में पड़ने वाले खुले मैदान के मालिकों को भी खासा नुकसान हुआ है। उन्होंने बताया कि मार्च अप्रैल महीने से ही इन क्षेत्रों में जिला प्रशासन के अधिकारियों का आना जाना शुरू हो जाता है। लोग जमीन मालिक अपने अपने जमींनों का प्लांटिंग कर लोगों को भाड़े पर देने लगते हैं। उनके एक महीने के इस कमाई से पूरा साल जीवन यापन चलता है।

क्या कहते हैं DM

श्रावणी मेला को लेकर भागलपुर के DM सुव्रत सेन ने बताया कि बिहार सरकार का न्यू गाइडलाइन नहीं आई है। उम्मीद नहीं है कि इस साल भी श्रावणी मेला का आयोजन हो लेकिन सरकार के नए गाइडलाइन का फिलहाल मई के पहले सप्ताह तक इन्तजार करना पड़ेगा।

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बिहार | दैनिक भास्कर

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