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ऐसे बढ़ते हैं आंकड़े: हर मानसून में प्रतिमाह होती है 150 बच्चों की मौत, इसी दाैरान तीसरी लहर का खतरा

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सूरत15 मिनट पहलेलेखक: सूर्यकांत तिवारी

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बच्चों के लिए 400 वेंटिलेटर की जरूरत, हैं सिर्फ 160

  • कोरोना के दौरान सीजनल बीमारियों की जांच और इलाज ही बंद कर दिए जाते हैं

सरकार का मकसद कोरोना की तीसरी लहर को रोकना है या बच्चों की जान बचाना है, क्योंकि हर मानसून के दौरान डेंगू-मलेरिया व डायरिया जैसी सीजनल बीमारियों से रोज 4-5 बच्चों की जान जाती है। इस तरह हर मानसून में प्रति माह लगभग 150 बच्चों की मौत होती है। सितंबर-अक्टूबर में तीसरी लहर आने के कयास लगाए जा रहे हैं।

ऐसे में अगर सीजनल बीमारियों से होने वाली बच्चों की मौतों को कोरोना में जोड़ दिया गया तो आंकड़े बढ़ ही जाएंगे। वैसे कोरोना में अन्य बीमारियों की जांच व इलाज बंद कर दिए जाते हैं। सरकारी अस्पताल में सभी मरीजों को कोरोना संदिग्ध मानकर इलाज किया जाता है। मनपा तीसरी लहर में बच्चों को बचाने के लिए कवायद कर रही है, जबकि बच्चों के इलाज से संबंधित चिकित्सा संसाधनों की कमी है।

इस समय शहर में बच्चों के लिए 160 वेंटिलेटर हैं, जबकि 400 की जरूरत है। इसी तरह विशेषज्ञ डॉक्टर और नर्सों का भी हाल है। मनपा ने संभावित तीसरी लहर को लेकर पीडियाट्रिक डॉक्टरों के बैठक की है। एक टास्क फोर्स का गठन भी किया गया है। डॉक्टर अभी से ही आने वाले दिनों में इलाज को लेकर चर्चा कर रहे हैं।

दूसरी तरफ मानसून आने वाला है। बारिश के मौसम में बच्चों में डेंगू, मलेरिया, डायरिया व टाइफाइड जैसी बीमारियां बढ़ जाएंगी। इन बीमारियों से हर साल होने वाली बच्चों की मौतों को तो मनपा रोक नहीं पा रही है। हर साल जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई-अगस्त, सितंबर तक रोज 1000 से अधिक बच्चे सीजनल बीमारियों से पीड़ित होते हैं।

आशंका: 4 हजार बच्चों में 10% हो सकते हैं क्रिटिकल

कोरोना की तीसरी लहर से बच्चों को बचाने के लिए मनपा ने शहर के पांच निजी पीडियाट्रिक डॉक्टरों की टास्क फोर्स बनाई है। ये डॉक्टर विभिन्न स्तरों पर तैयारी और मार्गदर्शन कर रहे हैं। यह टास्क फोर्स मनपा के साथ सारा डेटा शेयर करेगी। हाल ही में इस टीम की मनपा के अधिकारियों के साथ बैठक हुई।

इस बैठक में पीडियाट्रिक डॉक्टरों ने आशंका व्यक्ति की कि अगर तीसरी लहर में करीब 3 से 4 हजार बच्चे संक्रमित हुए तो उनमें से 10 फीसदी बच्चे क्रिटिकल हो सकते हैं। उन्हें ऑक्सीजन, बाइपेप या वेंटिलेटर की जरूरत होगी। इसके लिए कम से कम 400 वेंटिलेटर की जरूरत होगी, जबकि अभी शहर में बच्चों के लिए मात्र 160 वेंटिलेटर हैं।

बच्चों के वेंटिलेटर अलग होते हैं। 60 वेंटिलेटर सिविल और स्मीमेर अस्पताल में हैं। 40 वेंटिलेटर निजी अस्पतालों में हैं। तीसरी लहर को देखते हुए नर्सिंग स्टाफ व अन्य संबंधित लोगों को ट्रेनिंग देने की शुरुआत हो चुकी है।

यह है स्थिति

शहर में 300 अस्पतालों में बच्चों का इलाज होता है। इनमें करीब 2500 नर्सिंग स्टाफ हैं। बच्चों के डॉक्टर भी 300 से अधिक हैं। मौजूदा स्थिति की बात करें तो 200 से अधिक एनआईसीयू, 150 पीआईसीयू हैं, जबकि 2000 बेड का भी इंतजाम है। शहर की 60 लाख आबादी में 35 से 40 फीसदी आबादी 0 से 18 साल की है।

सिविल: 43 बेड पर 80 बच्चों का होता है इलाज

मानसून के दौरान सरकारी अस्पतालों में सीजनल बीमारियों के मरीजों की भीड़ लग जाती है। ऐसे में बेड फुल हो जाते हैं। बच्चे छोटे होते हैं, इसलिए सरकारी अस्पतालों में एक बेड पर तीन-तीन बच्चों का इलाज होता है। सिविल के पीडियाट्रिक विभाग की प्रोफेसर डॉ. अपूर्वा शाह ने बताया कि मानसून आते ही डेंगू, मलेरिया, बैक्टीरियल, डायरिया, निमोनिया के मरीजों की संख्या बढ़ जाती है। अभी हमारे एनआईसीयू में करीब 15 नवजात बच्चों का इलाज चल रहा है। मानसून में हमारे 43 बेड पर 70 से 80 बच्चों का इलाज होता है।

सीजनल बीमारियों की जांच कोरोना में नहीं होती

पीडियाट्रिशियन डॉक्टर प्रशांत कारिया ने बताया कि सूरत में 300 से अधिक पीडियाट्रिक डॉक्टर हैं और करीब इतने ही अस्पताल हैं। ऐसे में तीसरी लहर आने पर जो तैयारी हो रही है वह जरूरी है। साथ ही मानसूनी बीमारियों की भी चुनौती हर साल की तरह बनी रहेगी।

मार्च 2020 से शहर में कोरोना शुरू हुआ था। तब से लेकर अब तक सीजनल बीमारियों की ना तो जांच होती है और ना ही इसका सही से इलाज दिया जाता है। ऐसे में तीसरी लहर आने पर कहीं फिर से कोरोना के चक्कर में सीजनल बीमारियों को दरकिनार न कर दिया जाए।

आंगनवाड़ी वर्करों के साथ वॉलंटियर को भी दी जाएगी ट्रेनिंग, परिजनों के लिए हेल्पलाइन होगी

मानसून में सिविल-स्मीमेर की ओपीडी में रोज आने वाले 700-800 बच्चों में से 40% को भर्ती करने की जरूरत पड़ती है। जुलाई 2019 में सिविल अस्पताल में डेंगू, मलेरिया, टाइफाइड और डायरिया से 100 से अधिक बच्चों की मौत हुई थी। पीडियाट्रिशियन डॉ. दिगंत शात्री ने बताया कि मनपा, राज्य सरकार और यूनिसेफ के सहयोग से सूरत में पीडियाट्रिक एसोसिएशन अभी से ही काम पर लग गया है।

अभी कोविड मैनेजमेंट ट्रेनिंग फॉर नर्सिंग, मेडिकल ऑफिसर, डॉक्टर एंड हेल्थ वर्कर के लिए ऑनलाइन और ऑफलाइन ट्रेनिंग दी जाएगी। इसके साथ ही आंगनवाड़ी वर्करों को भी ट्रेंड किया जाएगा, ताकि वे समय से बच्चों की स्थिति का पता लगा सकें। परिजनों के लिए हेल्पलाइन भी होगी। वाॅलंटियर को भी ट्रेंड किया जाएगा। अस्पतालों को भी गाइडलाइन के तहत तैयार किया जाएगा।

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