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कश्मीर घाटी: कभी गूंजे थे ‘यहां क्या चलेगा- निजाम-ए-मुस्तफा’ के नारे, अब मस्जिदों में हो रही अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की बात

सार

कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति (केपीएसएस) के अध्यक्ष संजय टिक्कू ने बहुसंख्यक समुदाय के धर्म गुरुओं को एक संदेश भेजा है, जिसमें मस्जिदों के आलिमों और मौलवियों से अल्पसंख्यक समुदाय को सुरक्षा का अहसास कराने की गुजारिश की गई।

कश्मीर घाटी की मस्जिद, फाइल फोटो
– फोटो : बासित जरगर

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कश्मीर घाटी में जिन मस्जिदों से 90 के दशक में ‘यहां क्या चलेगा- निजाम-ए-मुस्तफा’ के नारे गूंजते थे, आज उन्हीं मस्जिदों से बहुसंख्यक समुदाय के लोगों द्वारा अल्पसंख्यकों को खासकर कश्मीरी पंडितों को सुरक्षा का आश्वासन दिया जा रहा है। उनसे घरों को न छोड़ने की अपील की जा रही है। दरअसल कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति (केपीएसएस) के अध्यक्ष संजय टिक्कू ने बहुसंख्यक समुदाय के धर्म गुरुओं को एक संदेश भेजा है, जिसमें मस्जिदों के आलिमों और मौलवियों से अल्पसंख्यक समुदाय को सुरक्षा का अहसास कराने की गुजारिश की गई।

टिक्कू ने बताया कि उनके द्वारा की गई अपील का असर हुआ है। श्रीनगर की करीब आठ मस्जिदों से पिछले शुक्रवार से अब तक अल्पसंख्यकों को सुरक्षा का आश्वासन दिया जा चुका है। लेकिन जहां भी कश्मीरी पंडित, सिख या फिर प्रवासी मजदूर रह रहे हैं, वहां भी मस्जिदों से ऐसी अपीलें की जाती हैं तो शायद अगले सप्ताह से हालात सामान्य होना शुरू हो जाएंगे।
यह भी पढ़ें- अब्दुल्ला का राष्ट्रप्रेम: कहा- कश्मीर भारत का अंग, पढ़ें वो वाकया जब उनको दिखाए गए जूते, फिर ‘सिरफिरों’ को दिया था ये जवाब    

उन्होंने कहा कि मैं हमेशा यह कहता हूं कि मेरी सुरक्षा की जरूरत नहीं है, बल्कि मुझे सामाजिक सुरक्षा चाहिए, जो पिछले 32 सालों से यहां मिल रही थी। लेकिन 32 साल के बाद अगर उनके पड़ोसी या अन्य लोग चुप्पी साध लिए हैं तो मुझे लगता है कि यहां के लोग यह नहीं चाहते कि अल्पसंख्यक समुदाय के लोग यहां रहें।

टिक्कू ने कहा कि उन्हें बहुसंख्यक समुदाय से सौ प्रतिशत प्रोत्साहन चाहिए। 2007 में जब पहली बार उनके संगठन द्वारा कई वर्षों बाद श्रीनगर में दशहरा मनाया, तब केवल उनके ही समुदाय के 100 लोग शामिल हुए थे, लेकिन जब 2009 में फिर से दशहरा मनाया गया तो करीब 35000 लोगों ने इसमें शिरकत की, जिसमें से हमारे कुल 500 लोग थे। आज भी वैसा ही प्रोत्साहन चाहिए। वहीं, नागरिकों की हत्या के बाद पलायन कर गए परिवारों के बारे में कहा कि उन्हें जो जानकारी है अभी तक करीब आठ परिवार यहां से निकले हैं, लेकिन उनमें से कई अस्थायी तौर पर गए हैं, जो जल्द वापस लौटेंगे। पुलिस की हेल्पलाइन को उन्होंने अच्छा कदम बताया। 

 

ऑल पार्टी सिख को-ऑर्डिनेशन कमेटी के अध्यक्ष जगमोहन सिंह रैना ने भी इस हेल्पलाइन का स्वागत किया है, लेकिन कहा कि उन्हें नहीं लगता कि इसकी जरूरत थी। पुलिस के हेल्पलाइन नंबर से भी ज्यादा यहां के बहुसंख्यक लोगों की हेल्पलाइन को जरूरी मानते हैं। उन्होंने छट्टी सिंघपोरा और महजूर नगर के हत्याकांड का हवाला देते कहा कि ऐसी घटनाओं के बाद भी कश्मीर में बहुसंख्यक समुदाय के साथ लगाव काफी अच्छा रहा।

रैना ने कहा कि हेल्पलाइन केवल श्रीनगर और अन्य उन जगहों पर मदद दे सकती है, जहां नेटवर्क है, लेकिन सिख करीब 124 गांवों में रहते हैं, वहां तो केवल बहुसंख्यक ही हमारा सहारा हैं। उम्मीद करते हैं कि यह भाईचारा आगे भी कायम रहेगा। बहुसंख्यक समुदाय को गंभीरता से सोचना होगा कि भाईचारा कैसे कायम रखा जाए।

विस्तार

कश्मीर घाटी में जिन मस्जिदों से 90 के दशक में ‘यहां क्या चलेगा- निजाम-ए-मुस्तफा’ के नारे गूंजते थे, आज उन्हीं मस्जिदों से बहुसंख्यक समुदाय के लोगों द्वारा अल्पसंख्यकों को खासकर कश्मीरी पंडितों को सुरक्षा का आश्वासन दिया जा रहा है। उनसे घरों को न छोड़ने की अपील की जा रही है। दरअसल कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति (केपीएसएस) के अध्यक्ष संजय टिक्कू ने बहुसंख्यक समुदाय के धर्म गुरुओं को एक संदेश भेजा है, जिसमें मस्जिदों के आलिमों और मौलवियों से अल्पसंख्यक समुदाय को सुरक्षा का अहसास कराने की गुजारिश की गई।

टिक्कू ने बताया कि उनके द्वारा की गई अपील का असर हुआ है। श्रीनगर की करीब आठ मस्जिदों से पिछले शुक्रवार से अब तक अल्पसंख्यकों को सुरक्षा का आश्वासन दिया जा चुका है। लेकिन जहां भी कश्मीरी पंडित, सिख या फिर प्रवासी मजदूर रह रहे हैं, वहां भी मस्जिदों से ऐसी अपीलें की जाती हैं तो शायद अगले सप्ताह से हालात सामान्य होना शुरू हो जाएंगे।

यह भी पढ़ें- अब्दुल्ला का राष्ट्रप्रेम: कहा- कश्मीर भारत का अंग, पढ़ें वो वाकया जब उनको दिखाए गए जूते, फिर ‘सिरफिरों’ को दिया था ये जवाब    

उन्होंने कहा कि मैं हमेशा यह कहता हूं कि मेरी सुरक्षा की जरूरत नहीं है, बल्कि मुझे सामाजिक सुरक्षा चाहिए, जो पिछले 32 सालों से यहां मिल रही थी। लेकिन 32 साल के बाद अगर उनके पड़ोसी या अन्य लोग चुप्पी साध लिए हैं तो मुझे लगता है कि यहां के लोग यह नहीं चाहते कि अल्पसंख्यक समुदाय के लोग यहां रहें।

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बहुसंख्यक समुदाय से सौ प्रतिशत प्रोत्साहन चाहिए

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