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दशहरा पर होती है विशेष पूजा: बौद्ध और सनातन शक्ति का संगम है जिले का चंपेश्वरी मंदिर

हजारीबाग21 घंटे पहलेलेखक: मुरारी सिंह

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शहर से 26 किलोमीटर की दूरी पर चंपानगर नावाडीह गांव में हजारों वर्ष पुराना है चंपेश्वरी माता का मंदिर।

हजारीबाग का क्षेत्र गौरवशाली इतिहास के साथ-साथ विशिष्ट संस्कृति को समेटे हुए हैं। इस क्षेत्र में शैल चित्र के रूप में आदिकालीन मानव के कई प्रागैतिहासिक साक्ष्य के साथ-साथ बौद्धकालीन पुरातात्विक अवशेष भी भरे पड़े हैं। संपूर्ण क्षेत्र के कई मंदिरों में बौद्ध कालीन मूर्तियों की पूजा, शक्ति के उपासक सनातन धर्मावलंबी प्राचीन काल से करते आ रहे हैं। इसी में से एक चंपेश्वरी माता हैं।

हजारीबाग शहर से उत्तर-पश्चिम दिशा में 26 किलोमीटर की दूरी पर चंपानगर नावाडीह गांव में हजारों वर्ष पुराना चंपेश्वरी माता का मंदिर है। मंदिर में चंपेश्वरी माता के साथ दो और मूर्तियां है। जिसे भैरव और देवी के रूप में पूजा जाता है। चंपेश्वरी मंदिर में बेसाल्ट रॉक की दोनों मूर्तियां इस क्षेत्र के सनातन धर्मावलंबियों के आस्था का केंद्र है। नवरात्र में यहां विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।

इस मंदिर से मात्र 30 किलोमीटर की दूरी पर इटखोरी का प्रसिद्ध भद्रकाली मंदिर है। भद्रकाली मंदिर जहां बौद्ध जैन और सनातन संस्कृतियों के पुरातात्विक साक्ष्य के साथ धार्मिक समन्वयन को देखा जा सकता है। ईचाक प्रखंड स्थित चंपेश्वरी मंदिर में स्थापित मूर्तियां हजारीबाग के सीतागढ़ा बहोरनपुर ग्राम में हाल ही खुदाई से प्राप्त अवलोकितेश्वर की मूर्ति से मिलती हैं।

मूर्तियां महायान बौद्ध धर्मावलंबियों के अवलोकितेश्वर शक्ति के रूप में रही होगी। चंपेश्वरी मंदिर के दो मूर्तियों की अवलोकितेश्वर के रूप में पहचान हजारीबाग में खुदाई करने वाले पुरातत्वविद डॉ राजेंद्र देहूरी, डॉ नीरज मिश्रा और विनोबा भावे विश्वविद्यालय के मानव विज्ञानी डॉ गंगानाथ झा ने भी किया है। गंगानाथ झा के अनुसार मूर्तियां महायान शैली की हैं। जिनमें से एक सिंह सवार सिंह अवलोकितेश्वर हैं।

बहोरनपुर से प्राप्त अवलोकितेश्वर मूर्तियों में बनाए गए अन्य प्रतीक चिन्ह की तरह ही चंपेश्वरी मंदिर स्थापित मूर्तियों में अंकित है। इटखोरी का भद्रकाली बौद्ध संस्कृति के तारा का एक रूप है। भद्रकाली के पैर के दोनों ओर दो मूर्तियां बनी हुई हैं। बौद्ध कालीन तारा का रूप है। चंपेश्वरी माता के मंदिर में पूजित होने वाली मूर्तियां भी इन्हीं शैली की बनी हुई है।

दोनों मंदिर आस्था का अदभुत केंद्र है साथ ही क्षेत्रीय धार्मिक पर्यटन के रूप में विकसित है। इस क्षेत्र की संस्कृति पर कार्य करने वाले मानव विज्ञान विभाग के शिक्षक डॉ गंगानाथ झा ने इस क्षेत्र के पुरातात्विक अवशेष एवं लोक संस्कृति की निरंतरता के ऊपर किए गए शोध के आधार पर कहते हैं कि यह संपूर्ण क्षेत्र बौद्ध और सनातन संस्कृति का संगम स्थल है।

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