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धूनीवाले दादाजी दरबार: न चंदा न पंडा और न धंधा… यहां चलता है सिर्फ डंडा; दादाजी भक्तों की पहचान है अनुशासन और मर्यादा

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  • Neither Donation Nor Panda Nor Business… Only Stick Runs Here; The Identity Of The Devotees Is Discipline And Dignity.

खंडवा24 मिनट पहले

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दादाजी धूनीवालें मंदिर। (फाइल फोटो)

न चंदा न पंडा और न धंधा… यहां चलता है सिर्फ डंडा, वो भी साक्षात शंकर अवार श्री दादाजी धूनीवाले का। खंडवा में दादाजी धूनीवाले का दरबार जहां प्रतिवर्ष गुरु पूर्णिमा पर पांच लाख भक्त महाराष्ट्र राजस्थान, दिल्ली से आकर मत्था टेकते हैं, वहां कोरोना काल में लगातार दूसरे साल भी दरबार में भक्त अनुशासित है। दादाजी दरबार नियम कायदों और सख्त अनुशासन के साथ गुरु शिष्य परंपरा का निर्वहन करने वाला स्थान है।

साल 1930 में श्री केशवानंदजी महाराज श्री दादाजी ने खंडवा में जिस स्थान पर अंतिम विश्राम किया, उसी जगह पर लाखों की भक्तों की आस्था का केंद्र दादाजी दरबार बना। 1942 में उनके उत्तराधिकारी श्री हरीहर भोले भगवान श्री छोटे दादाजी ने भी अपनी इहलीला त्याग दी, उन्हें भी पूरी मर्यादा के साथ ही समाधिस्थ किया गया है। गुरु शिष्य की समाधि पूरे अनुशासन और मर्यादा के साथ दर्शनीय है।

कोरोनाकाल से पहले गुरु पूर्णिमा पर श्रद्वालुओं की रहती थी भीड़।

कोरोनाकाल से पहले गुरु पूर्णिमा पर श्रद्वालुओं की रहती थी भीड़।

– पिछले दो साल से मायूस है दादाजी के भक्त

दादाजी के भक्त पिछले दो साल से मासूम है क्योंकि उन्हें यह प्रत्यक्ष परमात्मा के दर्शन समाधि स्पर्श का सौभाग्य नहीं मिल पा रहा है किंतु निराष नहीं है। जिला प्रशासन के साथ संक्रमण रोकने के लिए किये कारगर उपायों के परिपालन में दादाजी दरबार ट्रस्ट अथवा भक्तों के बीच कभी कोई नानुकूर नहीं हुई। लाखों भक्तों के बावजूद हर एक भक्त ने मौजूदा परिस्थितियों में दूर से ही समाधि दर्शन की परिपाटी को स्वीकार कर लिया। गत साल निशान पेश तक करने की अनुमति नहीं थी तो उसे भी सहजता से लिया, इस साल दो दिन पूर्व तक परंपरागत निशानों को दरबार में पेश करने की अनुमति मिली तो सैकड़ों किमी दूर से पैदल निकले और तय समय से पहले आकर दर्शन एवं निशान पेश कर दिए। नागपुर, बैतुल, पाहुना, सीसर, छिंदवाड़ा सहित अनेक स्थानों से परंपरागत रूप से लोग सैकड़ों किसी दूर से पैदल यहां आते हैं।

– स्व अनुशासित है खंडवा का दादाजी दरबार

ट्रस्टी सुभाष नागोरी बताते है कि यहां आने वाले भक्त दरबार में दादाजी की प्रत्यक्ष उपस्थिति को स्वीकार करते हैं, यही कारण है कि स्व अनुशासित है। दरबार के कायदों का पालन करते है। प्रशासन अथवा पुलिस को कभी यहां मशक्कत नहीं करना पड़ती, एक स्वयं सेवक का आदेश भी दादाजी का आदेश मानकर हजारों लोग चुपचाप खड़े रह जाते है। यह अनोखा शहर है खंडवा जो गुरु पूर्णिमा पर्व पर कमाने के दिन आने पर खुद को लुटाने के लिए तैयारी करता है। यह सब दादाजी धुनीवालों की लीला ही है। इस दौर में यह चमत्कार उनकी कृपा का ही परिणाम है।

– अन्य धर्म स्थलों की तरह यहां कोई पंडा या पुजारी नहीं

आम धार्मिक स्थलों के मुकाबले दादाजी दरबार इसलिए भी अलग हटकर है क्योंकि यहां कोई पंडा अथवा पुजारी नहीं है न पूजा पाठ, अभिषेक या इत्यादि के लिए दवा है और न ही भक्तों से किसी भी प्रकार का चंदा मांगा जाता है। सबसे बड़ी बात दरबार से जुड़ी कोई भी वस्तु, नारियल प्रसाद चादर, निशान इत्यादि कुछ बेचा नहीं जाता। जो आता है वो भक्तों को निःशुल्क भेंट कर दिया जाता है। इसलिए कहा गया है कि न चंदा, न पंडा, न धंधा।

छोटे व बड़े दादाजी।

छोटे व बड़े दादाजी।

– 91 साल से सतत जल रही अखंड धूनी

बड़े दादाजी धूनीवाले जहां भी जाते वहां धूनी रमाकर बैठते थे इसीलिए उन्हें धूनीवाले दादाजी कहा जाता है। खंडवा में सबसे जीवंत और जागृत है धूनी जो कि दादाजी धूनीवाले द्वारा स्वयं 1930 में प्रज्जवलित की थी। यह धूनी आज भी अखंड स्वरूप में प्रज्जवलित है। यहां चौबीस घंटे सातों दिन हर खासो आम स्वयं अपने से यहां धूनी में सूखे नारियल स्वाहा किए जाने की परंपरा है।

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मध्य प्रदेश | दैनिक भास्कर

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