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बलरामपुर के देवीपाटन का मां पाटेश्वरी मंदिर: 51 शक्तिपीठों में से एक है मां पाटेश्वरी का मंदिर, जानिए मां का नेपाल से क्या है रिश्ता

बलरामपुर5 घंटे पहले

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बलरामपुर के देवीपाटन का मां पाटेश्वरी मंदिर।

बलरामपुर जिला मुख्यालय से 28 किलोमीटर की दूरी पर तुलसीपुर क्षेत्र में स्थित 51 शक्तिपीठों में एक शक्तिपीठ देवीपाटन का अपना एक अलग ही स्थान है। अपनी मान्यताओं और पौराणिक कथाओं के आधार पर जाने जाने वाले इस शक्तिपीठ का सीधा संबंध देवी सती व भगवान शंकर, गोखक्षनाथ के पीठाधीश्वर गुरु गोरक्षनाथ जी महराज सहित दानवीर कर्ण से है। यह शक्तिपीठ सभी धर्म, जातियों के आस्था का केंद्र है। यहां देश-विदेश से तमाम श्रद्धालु मां पटेश्वरी के दर्शन को आते हैं। ऐसी मान्यता है कि माता के दरबार में मांगी गई हर मुराद पूर्ण होती है। कोई भी भक्त यहां से निराश होकर नहीं लौटता है।

जानिए क्या है शक्तिपीठ देवीपाटन का इतिहास

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव की पत्नी देवी सती के पिता दक्ष प्रजापति द्वारा एक यज्ञ का आयोजन किया गया था, लेकिन उस यज्ञ में देवी सती के पति भगवान शंकर को आमंत्रित तक नहीं किया गया, जिससे क्रोधित होकर देवी सती अपने पति भगवान शंकर के अपमान को न सह सकीं और यज्ञ कुंड में अपने शरीर को समर्पित कर दिया था।

इस बात की सूचना जब कैलाश पति भगवान शंकर को हुई तो वह स्वयं यज्ञ स्थल पहुंचे और भगवान शिव ने अत्यंत क्रोधित होकर देवी सती के शव को अग्नि से निकाल लिया और शव को अपने कंधे पर लेकर ताण्डव किया, जिसे पुराणों में शिव तांडव के नाम से जाना जाता है। भगवान शिव के तांडव से तीनों लोकों में त्राहि-त्राहि मच गई, जिसके बाद भगवान बह्मा के आग्रह पर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती के शरीर को विच्छेदित कर दिया, जिससे भगवान शिव का क्रोध शांत हो सके। विच्छेदन के बाद देवी सती के शरीर के भाग जहां-जहां गिरा, वहां-वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। बलरामपुर जिले के तुलसीपुर क्षेत्र में ही देवी सती का वाम स्कन्द के साथ पट गिरा था। इसीलिए इस शक्तिपीठ का नाम पाटन पड़ा और यहां विराजमान देवी को मां पाटेश्वरी के नाम से जाना जाता है।

जानिए माता को किसका लगता है भोग, कैसे होती है पूजा

नवरात्रि के दिनों में है मां पाटेश्वरी की विशेष आराधना की जाती है। मंदिर के महंत मिथिलेश नाथ योगी बताते हैं कि यहां चावल की विशेष पूजा की जाती है। नवरात्रि के 9 दिन माता की पिंडी के पास चावल की ढेरी बनाकर माता का विशेष पूजन किया जाता है और बाद में उसी चावल को भक्तों में वितरित कर दिया जाता है। मिथिलेश दास जी बताते हैं कि रविवार के दिन माता को (हलवे) का भोग लगाया जाता है, जो उन्हें अति प्रिय है। साथ ही शनिवार को आटे व गुण से बना रोट का विशेष भोग लगाया जाता है। महंत मिथलेश नाथ जी बताते हैं कि नवरात्रि के दिनों में करीब 5 लाख लोग माता के दर्शन को देश और विदेशों से आते हैं, जिनको पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था मुहैया कराई जाती है। साथ ही भीड़ ज्यादा होने के कारण मंदिर परिसर में ही माता के विशेष पूजन-अर्चन के लिए व्यवस्था की जाती है। वहां वह स्वयं भी बैठकर 9 दिन माता का पूजन अर्चन करते हैं।

जानिए शक्तिपीठ देवीपाटन और नेपाल के रतननाथ जी महाराज का संबंध

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मां पाटेश्वरी के परम भक्त और सिद्ध महत्मा श्री रतननाथ जी महराज हुआ करते थे। जो अपनी सिद्ध शक्तियों की सहायता से एक ही समय में नेपाल राष्ट्र के दांग चौखड़ा व देवीपाटन में विराजमान मां पाटेश्वरी की एक साथ पूजा किया करते थे। उनकी तपस्या व पूजा से प्रसन्न होकर मां पाटेश्वरी ने उन्हें वरदान दिया कि मेरे साथ अब आपकी भी पूजा होगी, लेकिन अब आपको यहां आने की आवश्यक्ता नहीं होगी। अब आपकी सवारी आएगी, जिसके बाद से भारत के पड़ोसी राष्ट्र नेपाल से शक्तिपीठ देवीपाटन रतननाथ जी महाराज की सवारी आती है। रतननाथ जी की सवारी चैत्र नवरात्रि में द्वितीया के दिन देवीपाटन के लिए प्रस्थान करती है, जो पंचमी के दिन देवीपाटन पहुंचकर अपना स्थान ग्रहण करती है और नवमी तक यहीं विराजमान रहती है। तत्पश्चात नवमी की मध्य रात्रि को यह सवारी पुनः नेपाल राष्ट्र के लिए प्रस्थान करती है।

जानिए त्रेता युग से जल रहे अखण्ड धूना की कहानी

शक्तिपीठ के गर्भ गृह में एक अखण्ड धूना भी प्रज्जवलित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शंकर के अवतार मानें जानें वाले गुरु गोरक्षनाथ जी महराज ने त्रेता युग में मां पाटेश्वरी को प्रसन्न करने हेतु तपस्या की थी और एक अखण्ड धूना प्रज्जवलित किया था, जो त्रेता युग से आज वर्तमान समय में अनवरत रूप से जल रहा है। इस गर्भ गृह के कुछ सख्त नियम भी हैं। यहां सिर पर बिना कपड़ा रखे कोई भी श्रद्धालु प्रवेश नहीं कर सकता है। ऐसी मान्यता है कि यहां की राख को लोग अपने घर ले जाते हैं और भूत. पिशाच या साए आदि से पीड़ित व्यक्ति को यह राख (भभूत) स्पर्श मात्र से उसके कष्ट मिट जाते हैं और साए या कोई बाधा हो तो वो दूर हो जाती है।

जानिए उस सूर्यकुंड की कहानी, जिसमें कर्ण ने किया था स्नान

देवीपाटन मंदिर परिसर में ही उत्तर की तरफ एक विशाल सूर्यकुण्ड है। ऐसी मान्यता है कि महाभारत के समय में कर्ण ने यहीं पर स्नान किया था और सूर्य भगवान को अर्घ दिया था। इसीलिए इस कुण्ड को सूर्यकुण्ड के नाम से जाना जाता है।

माता को प्रसन्न करने के लिए नर्तकी नवरात्र में करती हैं नृत्य

मां पाटेश्वरी को प्रसन्न करने हेतु उनके द्वार पर नर्तकी का नृत्य और गायन भी अपना एक अलग महत्व रखता है। मां पाटेश्वरी के दरबार में दर्जनों नर्तकी बिना किसी स्थायी लाभ के स्वेछा से पौराणिक गायन व नृत्य करती हैं। ऐसी मान्यता कि इन नर्तकियों के ऐसा करने से मां प्रसन्न होती हैं।

कोरोना काल के बाद मंदिर में उमड़ रही भक्तों की भीड़

दो वर्षों तक कोरोना काल चल रहा था, जिससे लोग मंदिर तक नहीं पहुंच पा रहे थे और न ही मां पाटेश्वरी के दर्शन कर पा रहे थे, लेकिन अब स्थितियां थोड़ी सुधर रही हैं। कोरोना काल समाप्त हुआ है और मंदिर के कपाट भी खुल चुके हैं। नवरात्रि का समय है। देश-विदेश और कोने-कोने से लोग मां पाटेश्वरी के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। उनके सुरक्षा के लिए पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। हजारों की संख्या में सिपाहियों और ट्रैफिक को संभालने के लिए ट्रैफिक पुलिस की व्यवस्था सुनिश्चित की गई।

नवरात्रि के दिनों में देवीपाटन में मुंडन संस्कार का भी अपना महत्व है और ग्रामीण अंचलों से लोग मुंडन संस्कार के लिए देवीपाटन पहुंचते हैं, जिसके लिए विशेष मुंडान स्थल बनाया गया है। हालांकि भीड़ अधिक होने पर जहां-तहां लोग मुंडन संस्कार कराते नजर आ जाते हैं। व्यवस्था को सुनिश्चित करने के लिए समय-समय पर नियमों में तब्दीली की जाती रही है। इस वर्ष नवरात्रि में करीब 5 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने मां पाटेश्वरी के दर्शन किए और अभी भी दर्शनार्थियों के आने का सिलसिला जारी है।

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उत्तरप्रदेश | दैनिक भास्कर

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