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भास्कर इंटरव्यू विद बजरंग पूनिया: रूस में तैयारी कर रहे पहलवान, बोले- 65 किलोग्राम सबसे कठिन वेट कैटेगरी है, कोई भी किसी को भी हराने में सक्षम

चंडीगढ़42 मिनट पहलेलेखक: गौरव मारवाह

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प्रैक्टिस करते पहलवान बजरंग पूनिया।

भारतीय पहलवान और टोक्यो ओलिंपिक में हमारी सबसे बड़ी उम्मीद बजरंग पूनिया मेडल जीतने के लिए लगातार पसीना बहा रहे हैं। 27 साल के बजरंग रूस में ट्रेनिंग कर रहे हैं। वे ओलिंपिक में सबसे चुनौतीपूर्ण वेट कैटेगरी 65 किग्रा को मानते हैं। उनका मानना है कि इस कैटेगरी में कोई भी किसी को हराने में सक्षम है। वे पहली बार ओलिंपिक में खेलेंगे। उन्हें ओलिंपिक में दूसरी सीड मिली है। पेश है उनसे बातचीत के अंश…

ओलिंपिक में सबसे ज्यादा किससे टक्कर मिल सकती है?

ओलिंपिक रेसलिंग में 65 किग्रा कैटेगरी सबसे मुश्किल है। दुनिया भर के दिग्गज इसी कैटेगरी में हैं। इसमें कोई भी किसी को भी हरा सकता है, जिससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि लेवल किस तरह का है। जो जितना ज्यादा अच्छा करता है, उसे उतना ही भगवान का साथ मिलता है। वो किसी से भी जीत सकता है।

आप वर्ल्ड, एशियन, कॉमनवेल्थ रेसलिंग में मेडल जीत चुके हैं? ओलिंपिक मेडल के क्या मायने हैं?

ओलिंपिक में देश के लिए खेलना हर किसी का सपना होता है। भले ही आपने हर इवेंट में मेडल जीते हों, लेकिन ये मेडल सबसे खास है। हर इवेंट में मेरा लक्ष्य होता है कि अपना बेस्ट दूं। ओलिंपिक में भी इसी तरह खेलने उतरूंगा।

कोविड की वजह से ओलिंपिक की तैयारी पर क्या असर पड़ा?

शुरू के 9-10 महीने काफी मुश्किल थे। ट्रेनिंग का रूटीन काफी खराब हुआ। रेसलिंग में शारीरिक संपर्क काफी ज्यादा होता है, इसलिए कोविड नियमों को ध्यान में रखते हुए ट्रेनिंग काफी मुश्किल थी। कॉम्पिटीशन नहीं हो रहे थे। ये जरूरी होते हैं, क्योंकि यहीं पर आप विरोधी पहलवानों की गेम को समझते हैं और उसकी कमजोरियों को परखते हैं। मुझे इस दौरान पार्टनर भी नहीं मिला, जिसकी ट्रेनिंग में सबसे ज्यादा जरूरत होती है।

कोविड ने मेंटल हेल्थ पर भी प्रभाव डाला। इस बारे में क्या कहना है?

आपको किसी चैंपियनशिप में हिस्सा लेना हो या ट्रेनिंग कैंप में शामिल होना हो, क्वारेंटाइन रहना पड़ता है। ये मुश्किल समय होता है। एथलीट्स कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। ओलिंपिक की तैयारी के लिए ये सब बहुत मुश्किल है। मेरे अनुसार सभी को मानसिक तौर पर स्वस्थ रहते हुए सुरक्षा के साथ आगे बढ़ना होगा।

रोम रैंकिंग सीरीज में गोल्ड जीतना आपके लिए कितना अहम है?

इससे आत्मविश्वास बढ़ता है। पता चलता है कि ट्रेनिंग सही दिशा में जा रही है। ये भी ध्यान रखना होता है कि ये कामयाबी कॉन्फिडेंस को ओवरकॉन्फिडेंस में न बदल दे। मेरी रैंकिंग चाहे 1 हो या 10, मेरा लक्ष्य मेडल जीतना होता है। यदि मेडल नहीं जीता तो रैंकिंग का कोई फायदा नहीं। रैंकिंग टूर्नामेंट में खेलने का टारगेट यही होता है कि ओलिंपिक में किस तरह से सीड मिलेगी।

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