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रामपुर के वसीम से सीखें जिंदगी जीने का सलीखा: हादसे में गवां दिए थे दोनों हाथ, फिर भी नहीं मानी हार, पैरों से लिखते हैं, स्कूल की प्रतियोगिताओं में जीतते हैं सबका दिल

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रामपुर8 मिनट पहले

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आपने छोटी-छोटी बातों पर जिंदगी खत्म करने वालों में कई बार सुना और पढ़ा होगा, लेकिन रामपुर के बैंजना गांव के वसीम अली ऐसे ही लोगों के लिए मिसाल हैं। उम्र महज 10 साल है, लेकिन जज्बा ऐसा है कि हर कोई हैरान है। दरअसल, वसीम अली दिव्यांग हैं, उनके दोनों हाथ नहीं हैं। इसके बावजूद स्कूल जाते हैं। अपना होमवर्क भी खुद ही करते हैं। इतना ही नहीं स्कूल में होने वाली प्रतियोगिताओं में भी पार्टिसिपेट करते हैं और अव्वल भी आते हैं।

आइए जानते हैं कौन हैं वसीम अली….

घरवालों ने किसी तरह से संभाला। परिवार वालों ने कहा कि उसके हाथ खराब हो गए हैं, ठीक होने गए हैं।

घरवालों ने किसी तरह से संभाला। परिवार वालों ने कहा कि उसके हाथ खराब हो गए हैं, ठीक होने गए हैं।

हादसे में चले गए थे दोनों हाथ

2018 में वसीम अली चौथी कक्षा में पढ़ता था। दूसरे बच्चों की तरह ही उसकी जिंदगी भी सामान्य थी। लेकिन इसी दौरान वह हादसे के शिकार हो गया। हाईटेंशन लाइन की चपेट में आने से उसके दोनों हाथ पूरी तरह जल गए। डॉक्टरों को उसके दोनों हाथ काटने पड़े। मुश्किल से जान तो बच गई, लेकिन उसकी याददाश्त चली गई। करीब 8 महीने बाद धीरे-धीरे याददाश्त वापस आनी शुरू हुई। इसके बाद वह हाथ लाने की जिद पकड़कर बैठ गया।

घरवालों ने किसी तरह से संभाला। परिवार वालों ने कहा कि उसके हाथ खराब हो गए हैं, ठीक होने गए हैं। लेकिन समय के साथ उसे अपने साथ हुए हादसे की गंभीरता के बारे में पता चला। उसे समझ में आ गया, अब उसे बिना हाथों के ही जिंदगी गुजारनी है, लेकिन इसके बाद भी वसीम ने हार नहीं मानी।

स्कूल में छोटा भाई और स्कूल के बच्चे वसीम अली की मदद करते हैं।

स्कूल में छोटा भाई और स्कूल के बच्चे वसीम अली की मदद करते हैं।

संस्था के संचालक की सलाह से मिली नई राह

वसीम की हालत को लेकर उनके पिता हिमायत अली काफी परेशान रहने लगे। इलाज के दौरान अलीगढ़ मेडिकल कॉलेज में एक संस्था की संचालक ने वसीम के पिता हिमायत अली को सलाह दी कि वह वसीम को पैरों से लिखना सिखाएं। यहीं से वसीम को नई राह मिल गई। वसीम में पढ़ने और खेलने का जज्बा बचपन से ही था। इसलिए घर वालों के कहने पर वह फौरन तैयार हो गया। उसने पैरों से लिखने की प्रैक्टिस शुरू कर दी। कुछ ही दिनाें में वह पैरों से पहाड़े, गिनती आदि लिखने लगा।

हिमायत ने परेशानी बताई तो प्रिंसिपल ने अपने स्कूल में उसे एडमिशन दे दिया। साथ ही देखरेख के लिए उसके भाई को भी उसी स्कूल में एडमिशन कराने को कहा।

हिमायत ने परेशानी बताई तो प्रिंसिपल ने अपने स्कूल में उसे एडमिशन दे दिया। साथ ही देखरेख के लिए उसके भाई को भी उसी स्कूल में एडमिशन कराने को कहा।

हौसला देखकर सरकारी स्कूल के टीचर ने दिलाया एडमिशन

वसीम जब पैरों से लिखने लगा तो उसके पिता हिमायत अली स्कूल में एडमिशन कराने पहुंच गए। लेकिन स्कूल वालाें ने मना कर दिया। स्कूल वालाें का कहना था कि पढ़ने लिखने के लिए हाथों का होना जरूरी हैं, बिना हाथ के वो कैसे स्कूल में पढ़ेगा। इसके बाद परिवार वालों ने घर पर ही उसे पढ़ाना शुरू कर दिया। इसी दौरान उनके गांव में पड़ाेसी गांव हजरतपुर के मुजाहिद खान पहुंचे। वह सरकारी स्कूल में प्रिंसिपल हैं। वसीम के हौसले को देखकर उन्होंने उसके पिता से बात की। हिमायत ने परेशानी बताई तो उन्होंने अपने स्कूल में उसे एडमिशन दे दिया। साथ ही देखरेख के लिए उसके भाई को भी उसी स्कूल में एडमिशन कराने को कहा।

वसीम ने कोरोना काल के दौरान दो साल तक ऑनलाइन पढ़ाई की। वह अपना सारा होमवर्क खुद ही करके व्हॉट्सऐप से टीचर्स को भेजता था।

वसीम ने कोरोना काल के दौरान दो साल तक ऑनलाइन पढ़ाई की। वह अपना सारा होमवर्क खुद ही करके व्हॉट्सऐप से टीचर्स को भेजता था।

पैरों से होमवर्क करके भेजता था

वसीम की याददाश्त चली गई थी। साथ ही वह कई साल तक पढ़ाई से भी दूर रहा। इसलिए स्कूल में उसे पहली कक्षा में एडमिशन मिला। वसीम ने कोरोना काल के दौरान दो साल तक ऑनलाइन पढ़ाई की। वह अपना सारा होमवर्क खुद ही करके व्हॉट्सऐप से टीचर्स को भेजता था। इतना ही नहीं वह पैरों से मोबाइल चलाता है, उसमें गेम आदि भी खेलता है। अभी वह दूसरी कक्षा में है। प्रधानाध्यापक मुजाहिद खान बताते हैं कि वसीम विलक्षण प्रतिभा का मालिक है उसमें पढ़ाई का बहुत जज्बा है साथ ही वह पढ़ने में भी काफी तेज है।

वसीम को पढ़ने के साथ ही खेलकूद का भी जज्बा है। हाल ही में वसीम ने स्कूल में दौड़ की प्रतियोगिता में पार्टिसिपेट किया था।

वसीम को पढ़ने के साथ ही खेलकूद का भी जज्बा है। हाल ही में वसीम ने स्कूल में दौड़ की प्रतियोगिता में पार्टिसिपेट किया था।

रेस में चौथे नंबर पर आकर जीता सबका दिल

वसीम को पढ़ने के साथ ही खेलकूद का भी जज्बा है। हाल ही में वसीम ने स्कूल में दौड़ की प्रतियोगिता में पार्टिसिपेट किया था। स्कूल के टीचर्स वसीम के हाथ न होने के चलते पहले तो तैयार नहीं हुए। लेकिन उसकी जिद के आगे बाद में उन्हें अपना फैसला बदलना पड़ा। उन्होंने उसे दौड़ में शामिल कर लिया। दौड़ में वसीम ने अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन वह चौथे स्थान पर ही रह गया। प्रतियोगिता में आए हर किसी ने वसीम के हौसले की सराहना की। उसने अपने हौसले से सभी का दिल जीत लिया।

मुश्किल हालातों में भी वसीम ने हार नहीं मानी। अब वह पैरों से लिखते और गेम भी खेलते हैं।

मुश्किल हालातों में भी वसीम ने हार नहीं मानी। अब वह पैरों से लिखते और गेम भी खेलते हैं।

दिव्यांग होते हुए भी वसीम हाथ वालों के लिए नजीर बना हुआ है। मुश्किल हालात में भी कभी उसने हार नहीं मानी और हौसले बुलंद रखें। धीरे-धीरे वह अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है।

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उत्तरप्रदेश | दैनिक भास्कर

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