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वृंदावन में आत्मनिर्भर बन रहीं विधवा महिलाएं: तिरस्कार की जिंदगी छोड़ी, अब भगवान की सुंदर पोशाक बनाकर कर रहीं जीवन यापन

मथुरा5 मिनट पहले

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मां धाम में रह रहीं निराश्रित महिलाओं की फोटो।

दशकों से सामाजिक तिरस्कार का दंश झेल रही असहाय व निराश्रित महिलाएं भी अब बदलते समय के साथ कदमताल करने को तैयार है। वृंदावन में पहले भजन-कीर्तन और भिक्षावृत्ति कर जीवनयापन करने वाली वृद्ध माताएं अब मेहनत से दो जून की रोटी कमा रही है। वे अब पोशाक, मास्क व अन्य हस्तनिर्मित सामान को बनाकर अपना जीवन यापन कर रही हैं। इस तरह से वृन्दावन के आश्रय सदनों में रहने वाली माताएं आत्मनिर्भर बन रही हैं।

कान्हा की भक्ति में रम बना रहीं भगवान की पोशाक
भगवान राधा-कृष्ण की भूमि में हजारों निराश्रित महिलाएं रहकर भगवान का भजन कीर्तन करती हैं। भगवान की भक्ति में लीन रहने वाली माताएं अब सिलाई मशीन पर अपने हाथों की कला दिखाकर भगवान की सुंदर पोशाक बना रहीं हैं।

आत्मनिर्भर बन रहीं माता मास्क बनाते हुए

आत्मनिर्भर बन रहीं माता मास्क बनाते हुए

कोरोना से लड़ने के लिए बना रहीं आकर्षक मास्क

आश्रय सदनों में रहने वाली माताओं ने समाज के सहयोग के लिए हाथ बढ़ाया और कोरोना को हराने के लिए सबसे जरूरी हथियार मास्क बनाना शुरू कर दिया। इन माताओं को सामाजिक संस्था सुलभ इंटरनेशनल ने रॉ मेटेरियल उपलब्ध कराया। जिसके बाद इन्होंने करीब 4000 मास्क बना कर जरूरतमन्दों को मुफ्त में वितरित किया ।

अपनों ने छोड़ा गैरों ने संभाला

नगर के मां धाम आश्रम में रहने वाली एटा निवासी श्यामा देवी यादव के पति मलूक सिंह की 11 साल पहले मृत्यु हो गई थी। पति की मृत्यु के बाद 3 बेटों की मां श्यामा देवी को बेटे वृन्दावन दर्शन कराने ले आये और यहां आश्रम में छोड़ गए। मां को आश्रम में छोड़कर जाने के 3 महीने बाद ही बेटों को अपने किये का पछतावा हुआ तो वह श्यामा देवी को लेने आये लेकिन श्यामा देवी ने उनके साथ जाने से इंकार कर दिया। श्यामा देवी अब यहां रहकर पत्ते के दोने बनाकर अपनी काबिलियत साबित कर रहीं हैं।

मां शारदा महिला आश्रय सदन में रहने वाली बस्तर छतीसगढ़ की निवासी उषा दासी की बाल्यावस्था में ही शादी हो गई। 12 वर्ष की अवस्था मे शादी होने के 3 साल बाद ही बाल विधवा का दंश झेल अपने मायके में रही उषा दासी 20 साल पहले घर से निकल आयी और उसके बाद वृन्दावन में भगवान की भक्ति करने लगी। यहां आ कर उन्हें भक्ति तो मिल गयी लेकिन पेट की आग बुझाने को इन्होंने आश्रम में भगवान का भजन किया। जहां से कुछ चावल, आटा और 2 रुपये प्रतिदिन मिल जाते थे।

इस दौरान कई बार दुत्कार भी मिलती। लेकिन धीरे-धीरे समय बदला और उषा दासी ने तिरस्कार की जिंदगी से निकलकर अपने पैरों पर खड़े होने का निर्णय किया। सुलभ इंटरनेशनल संस्था ने उषा दासी को पोशाक बनाना सिखाया और आज उषा दासी भगवान की आकर्षक पोशाक बनाने में निपुण हो चुकी हैं।

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उत्तरप्रदेश | दैनिक भास्कर

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