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शीशियों में बंद न्याय: कोरोना काल के 6 माह में 350 लोगों ने पीया जहर, पुलिस सैंपल नहीं ले जा रही, आधे खराब

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सूरत9 घंटे पहलेलेखक: सूर्यकांत तिवारी

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पुलिस का इंतजार, सिविल अस्पताल में रोज 2 से 3 लोग जहर पीकर आ रहे, इससे बढ़ रहे सैंपल।

  • 3 माह में सैंपल खराब हो जाते हैं, ऐसे 50-60 फेंकने पड़े थे

कोरोना काल के 6 महीने में 350 लोग जहर पीकर सिविल अस्पताल आए। इनके सैंपल शीशियों में बंद अस्पताल में ही पड़े हैं, क्योंकि पुलिस इन्हें फॉरेंसिक जांच के लिए ले ही नहीं जा रही है। जहर के सैंपल की जांच तीन महीने में होनी जरूरी होती है। इस अवधि में जांच नहीं होने से 150 से ज्यादा सैंपल खराब हो चुके हैं। जहर पीना मेडिको लीगल केस होता है। अगर इनकी रिपोर्ट नहीं आएगी तो कोर्ट में मामले का निपटारा होने में समस्या होगी। खराब सैंपल को बायो मेडिकल कचरे में फेंक दिया जाएगा। 7-8 माह पहले ऐसे ही 50-60 सैंपल फेंकने पड़े थे।

सुसाइड अटेम्ट के ये 350 गैस्ट्रिक सैंपल तो पड़े हैं और रोज इनकी संख्या में इजाफा हो रही है। सिविल अस्पताल में आए दिन दो से तीन लोग जहर पीकर आ रहे हैं। जहर या जहरीला पदार्थ पीकर मरीज सिविल अस्पताल पहुंचते हैं तो डॉक्टर मुंह में नली डालकर पेट से जहर का सैंपल ले लेते हैं। इसे छोटी बोतल में भरकर सील पैक कर देते हैं। इस सैंपल की जांच फॉरेंसिक लैब में करानी होती है। मेडिको लीगल केस होने के कारण सैंपल को एफएसएल ले जाने का जिम्मा पुलिस का है।

सैंपल ले जाने की बात पर पुलिसकर्मी बाद में आने को कह निकल जाते हैं

सिविल अस्पताल में जहर पीकर आने वाले मरीजों का इलाज मेडिसिन विभाग के रेजिडेंट डॉक्टर करते हैं। मामला मेडिको लीगल का होता है, इसलिए ऑन ड्यूटी मेडिकल ऑफिसर पेट से गैस्ट्रिक सैंपल लेकर संबंधित पुलिस स्टेशन को जानकारी दे देते हैं। पुलिस जांच के लिए अस्पताल तो आती है, लेकिन सिर्फ कागजी कार्यवाही करने।

डॉक्टर पुलिसकर्मियों को सैंपल ले जाने के लिए कहते हैं तो वे बाद में आने को कह कर निकल जाते हैं। इलाज के दौरान कुछ मरीजों की मौत हो जाती है, जबकि कुछ ठीक भी हो जाते हैं। ऐसे में शीशियों में बंद सैंपल की जांच नहीं होने से कोर्ट में मामले का निपटारा नहीं हो पाता। डॉक्टरों का कहना है कि जहर पीना भी कानून गुनाह है। उन पर भी केस दर्ज होता है, इसलिए जांच जरूरी होती है।

पुलिस को दिलचस्पी नहीं, कहीं इन्हें भी बायो मेडिकल कचरे में न फेंकना पड़े

फॉरेंसिक विभाग के अनुसार जहर के सैंपल की जांच तीन महीने के भीतर जरूरी होता है। अगर इस अवधि में जांच नहीं हुई तो केमिकल रिएक्शन के कारण सैंपल में बदलाव आ जाता है। इससे जांच में वह जहर नहीं मिलता जिसे मरीज ने पिया या खाया था। कोरोना काल में 7 से 8 महीने पहले के ऐसे 50 से 60 सैंपल खराब हो गए थे। इन्हें बायो मेडिकल वेस्ट में फेंक दिया गया था। अब फिर से ऐसे सैंपल की संख्या बढ़ रही है। अगर समय पर इनकी जांच नहीं होती तो इन्हें भी बायो मेडिकल वेस्ट में फेंक दिया जाएगा। जहर पीने के मामलों मे पुलिस इसलिए ध्यान नहीं दे रही है कि अधिकतर मामलों में परिजन पूछताछ नहीं करते हैं। उन्हीं मामलों मे पुलिस एक्टिव होती है, जिनमें किसी के दबाव या मानसिक प्रताड़ित करने से व्यक्ति ने जहर पीया होता है।

जांच कराकर पुलिस को सूचित कर देंगे
फिलहाल हमें इस मामले की जानकारी नहीं है। इसकी जांच करवाएंगे। जांच में अगर पता चलता है कि पुलिस वाले नियम का पालन नहीं कर रहे हैं तो पुलिस कमिश्नर को सूचना देंगे। कुछ समय पहले तक कोरोना था, इसलिए लोग सिविल अस्पताल आते तक नहीं थे।
-डॉ. धारित्री परमार, एडि. अधीक्षक, सिविल अस्पताल

मुझे तो पता ही नहीं, जांच जरूर कराएंगे
मुझे तो सिविल अस्पताल में ऐसे सैंपल पड़े होने के मामले में अभी तक कोई जानकारी नहीं है। आप ऐसा बता रहे हैं तो मुझे पता चल रहा है। मैं इस बारे में मैं एक बार जांच जरूर करवाऊंगा। अगर वाकई में जहर पीने के मामले में सैंपल पड़े होने की ऐसी कोई समस्या है तो उसका निवारण अवश्य किया जाएगा।
– अजय तोमर, पुलिस आयुक्त, सूरत

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गुजरात | दैनिक भास्कर

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