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10 लाख साल पुरानी मिट्‌टी पर रिसर्च से दावा: भविष्य में भारत में मानसून ज्यादा तूफानी होगा; सूक्ष्म जीवों के फॉसिल्स से पता लगा- कार्बन डाई ऑक्साइड, नमी बढ़ने से बारिश बढ़ी

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एक घंटा पहलेलेखक: जॉन श्वार्टज

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पोट्सडैम इंस्टीट्यूट, जर्मनी में जलवायु सिस्टम के प्रोफेसर एंडर्स लीवरमेन कहते हैं, भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों के लिए परिणाम गंभीर होंगे।

नई रिसर्च ने बताया है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण भारत में मानसून के दौरान बारिश अधिक होगी। मौसम खतरनाक करवट लेगा। जर्नल एडवांस साइंसेस में शुक्रवार को प्रकाशित दस्तावेज में पिछले दस लाख वर्षों की स्थितियों के आधार पर मानसून पर गौर किया गया है। रिसर्च में कहा गया है कि आने वाले वर्षों में बहुत अधिक बारिश होने के दौर बार-बार आएंगे। मौसम के तेवर अप्रत्याशित होंगे। ये क्षेत्र के इतिहास पर असर डाल सकते हैं।

कंप्यूटर मॉडल पर आधारित पिछली रिसर्च के अनुसार ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से दुनिया गर्म हो रही है। नमी बढ़ने के कारण बहुत अधिक वर्षा होने की घटनाएं बढ़ेंगी। दक्षिण एशिया में जून से सितंबर के बीच मानसून सीजन के दौरान भारी वर्षा होती है। यहां रहने वाली विश्व की बीस फीसदी आबादी की जिंदगी के कई महत्वपूर्ण पहलू बरसात से जुड़े हैं। नई रिसर्च का कहना है, जलवायु परिवर्तन से होने वाले बदलाव क्षेत्र और उसके इतिहास को नया आकार दे सकते हैं।

शोधकर्ताओं के पास कोई टाइम मशीन नहीं थी इसलिए उन्होंने अपनी रिसर्च में गाद का इस्तेमाल किया है। बंगाल की खाड़ी की तलहटी से मिट्टी के सैम्पल ड्रिलिंग के जरिये निकाले गए। खाड़ी के बीच से निकाले गए मिट्टी के नमूने 200 मीटर लंबे थे। ये मानसून की वर्षा का भरपूर रिकॉर्ड उपलब्ध कराते हैं। खाड़ी में बारिश के मौसम में अधिक ताजा पानी आता है। इससे सतह पर खारापन कम हो जाता है। इस कारण सतह पर रहने वाले सूक्ष्म जीव मरते हैं और नीचे तलहटी में बैठ जाते हैं।

वहां उनकी कई परत बनती हैं। वैज्ञानिकों ने तलहटी के सैम्पल से मिले जीवों के जीवाश्मों का विश्लेषण किया। पानी के खारेपन का स्तर ऑक्सीजन के आइसोटोप से देखा गया। वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड का संग्रह अधिक होने, विश्व में बर्फ का स्तर कम रहने और क्षेत्र में नमी वाली हवाओं के लगातार बढ़ने के बाद भारी वर्षा और पानी में कम खारेपन की स्थितियां आई।

रिसर्च का कहना है,अब मानवीय गतिविधि से वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों का स्तर बढ़ रहा है। इस वजह से मानसून के एक जैसे पैटर्न सामने आने की संभावना है। ब्राउन यूनिवर्सिटी में स्टडी के प्रमुख स्टीवन क्लीमेंस बताते हैं, हम पुष्टि कर सकते हैं कि वातावरण में बीते लाखों वर्षों में कार्बन डाई ऑक्साइड बढ़ने से दक्षिण एशिया में मानसून के मौसम में भारी वर्षा हुई है। जलवायु के मॉडलों की भविष्यवाणी पिछले दस लाख साल की स्थितियों के अनुरूप पाई गई है।

मानसून के विनाशकारी होने का खतरा
पोट्सडैम इंस्टीट्यूट, जर्मनी में जलवायु सिस्टम के प्रोफेसर एंडर्स लीवरमेन कहते हैं, हमारे ग्रह के दस लाख साल के इतिहास की झलक दिखाने वाले डेटा की जानकारी आश्चर्यजनक हैं। लीवरमेन का कहना है, भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों के लिए परिणाम गंभीर होंगे। मानसून के दौरान पहले ही काफी वर्षा हो रही है। वह विनाशकारी हो सकता है। भयावह मानसून सीजन का खतरा बढ़ रहा है। डा. क्लीमेंस और अन्य शोधकर्ताओं ने एक तेल ड्रिलिंग शिप पर दो माह यात्रा की थी।

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